हरे समुद्री कछुए और प्लास्टिक: रियो के अध्ययन में कचरे जैसे बैक्टीरिया मिले
रियो डी जनेरियो में हुए एक अध्ययन ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि प्लास्टिक कचरा समुद्री सरीसृपों के शरीर में रहने वाले सूक्ष्मजीवों तक को कैसे प्रभावित करता है। नितेरोई के इटाइपू समुद्र तट पर किए गए इस अध्ययन में हरे समुद्री कछुओं (Chelonia mydas) के बैक्टीरिया की तुलना प्लास्टिक के टुकड़ों, समुद्री पानी और इलाके की शैवाल पर मिले बैक्टीरिया से की गई।
नतीजा चौंकाने वाला था: कछुओं के बैक्टीरिया उनके भोजन, यानी शैवाल, या पानी के बैक्टीरिया की तुलना में प्लास्टिक के बैक्टीरिया से ज़्यादा मिलते थे। फेडरल फ्लुमिनेंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता फिलिपे बरबेती के अनुसार, साहित्य में माना जाता था कि किसी जीव का माइक्रोबायोटा उसके भोजन जैसा होना चाहिए। प्लास्टिक कचरे के साथ सात प्रकार के बैक्टीरिया समान पाए गए, जिनमें Vibrio, Pseudomonas, Bacillus, Staphylococcus, Streptococcus, Chryseobacterium और Clostridium शामिल हैं।
इन समूहों में ऐसी प्रजातियां भी हैं जो जानवरों और इंसानों में बीमारी पैदा कर सकती हैं। लेकिन शोधकर्ता खुद स्पष्ट करते हैं कि इन बैक्टीरिया को कछुओं की बीमारियों से जोड़ने वाला कोई विश्लेषण नहीं हुआ, और पहचान केवल जीनस स्तर तक हो पाई, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कोई रोगजनक था। अध्ययन में गुआनाबारा खाड़ी के संरक्षण में काम करने वाली अरुआना परियोजना द्वारा एकत्र किए गए पांच कछुए इस्तेमाल हुए। नतीजे अगस्त में Environmental Pollution पत्रिका में छपे।
मुझे लेखकों की ईमानदारी अच्छी लगी कि उन्होंने अपने काम की सीमाएं खुलकर बताईं। सरीसृपों पर नज़र रखने वालों के लिए यह याद दिलाने वाली बात है कि कछुए प्रवास के दौरान समुद्री बैक्टीरिया भी फैला सकते हैं।
स्रोत: Super / Agência Brasil
नतीजा चौंकाने वाला था: कछुओं के बैक्टीरिया उनके भोजन, यानी शैवाल, या पानी के बैक्टीरिया की तुलना में प्लास्टिक के बैक्टीरिया से ज़्यादा मिलते थे। फेडरल फ्लुमिनेंस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता फिलिपे बरबेती के अनुसार, साहित्य में माना जाता था कि किसी जीव का माइक्रोबायोटा उसके भोजन जैसा होना चाहिए। प्लास्टिक कचरे के साथ सात प्रकार के बैक्टीरिया समान पाए गए, जिनमें Vibrio, Pseudomonas, Bacillus, Staphylococcus, Streptococcus, Chryseobacterium और Clostridium शामिल हैं।
इन समूहों में ऐसी प्रजातियां भी हैं जो जानवरों और इंसानों में बीमारी पैदा कर सकती हैं। लेकिन शोधकर्ता खुद स्पष्ट करते हैं कि इन बैक्टीरिया को कछुओं की बीमारियों से जोड़ने वाला कोई विश्लेषण नहीं हुआ, और पहचान केवल जीनस स्तर तक हो पाई, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कोई रोगजनक था। अध्ययन में गुआनाबारा खाड़ी के संरक्षण में काम करने वाली अरुआना परियोजना द्वारा एकत्र किए गए पांच कछुए इस्तेमाल हुए। नतीजे अगस्त में Environmental Pollution पत्रिका में छपे।
मुझे लेखकों की ईमानदारी अच्छी लगी कि उन्होंने अपने काम की सीमाएं खुलकर बताईं। सरीसृपों पर नज़र रखने वालों के लिए यह याद दिलाने वाली बात है कि कछुए प्रवास के दौरान समुद्री बैक्टीरिया भी फैला सकते हैं।
स्रोत: Super / Agência Brasil
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